नाना साहेब ने कानपुर में ब्रिटिश के खिलाफ विद्रोह की नेतृत्व की थी। इस विद्रोह के दौरान ब्रिटिश सैनिकों और उनके परिवारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की गई थी, जिसे "कानपुर की नरसंहार" के रूप में जाना जाता है।
उन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार "सती-छव्वी" नामक समारोह आयोजित किया, जिसमें उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन की बलिदान का संकल्प लिया।