मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर,1796 कोआगरा, उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ था।
मिर्जा गालिब उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि तथा महान शायर थे. उनका पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खां था. इसके अलावा मिर्जा गालिब के दो तखल्लुस, असद् (शेर) और ग़ालिब (बलवान) थे. उन्हें मिर्जा नौशा और गालिब के नाम से भी जाना जाता था.
बहादुर शाह जफर के दौरान उन्हें “दबीर उल मुल्क” के खिताब से नवाजा गया था। उन्हें न सिर्फ अपनी उम्दा शायरी के लिए जाना जाता था बल्कि उनका फक्कड़ मिजाज भी उनकी मशहुरियत के कारणों में से एक है.
इनको उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है.
गालिब ने सिर्फ 11 साल की उम्र में शायरी लिखने की शुरुआत कर दी थी. मिर्जा मुगल साम्राज्य के अंतिम वर्षों में उर्दू और फारसी के शायर के तौर पर मशहूर हुए.
गालिब ने मुगल सल्तनत का सूर्यास्त और अंग्रेजी हुकूमत का सूर्योदय होते देखा. मिर्जा गालिब की शायरी में 1857 की क्रांति का जिक्र भी मिलता है.
दिल्ली के चांदनी चौक के बल्लीमारान इलाके के कासिम जान गली में स्थित गालिब के घर को “गालिब मेमोरियल” में तब्दील कर दिया गया है|
एक मुसलमान होने के बावजूद गालिब ने कभी रोजा नहीं रखा| वह खुद को आधा मुसलमान कहते थे|
एक बार एक अंग्रेज अफसर द्वारा इसके बारे में पूछने पर उन्होंने बताया था कि मैं शराब पीता हूँ लेकिन सूअर नहीं खाता हूँ, अतः मैं आधा मुसलमान हूँ|
गालिब को 7 बच्चों का पिता बनने का अवसर प्राप्त हुआ था लेकिन दुर्भाग्यवश उनका कोई भी बच्चा 15 महीनों से अधिक समय तक जीवित नहीं रहा|